चूल्हे में खुद को खपाते हुए देखा है
दूसरो को खाना खिलाते हुए देखा है
पर क्या कभी तुमने
माँ को खाना खाते हुए देखा है
दूसरो को खाना खिलाते हुए देखा है
पर क्या कभी तुमने
माँ को खाना खाते हुए देखा है
मुकम्मल जहा की तलाश में हम ही कितना खो गए,
खुद को देखा न खुदा को मसरूफ़ इतना हो गए,
जिसका ख्वाब देखा था वो तो न मिला हरगिज़,
लगता है पहचान बदल गई हमारी,
पहले क्या थे और अब क्या हो गए