मुकम्मल जहा की तलाश में हम ही कितना खो गए, खुद को देखा न खुदा को मसरूफ़ इतना हो गए, जिसका ख्वाब देखा था वो तो न मिला हरगिज़, लगता है पहचान बदल गई हमारी, पहले क्या थे और अब क्या हो गए
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