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Saturday, 30 April 2016

Post004 मुकम्मल जहाँ

मुकम्मल जहा की तलाश में हम ही कितना खो गए,
खुद को देखा न खुदा को मसरूफ़ इतना हो गए,
जिसका ख्वाब देखा था वो तो न मिला हरगिज़,
लगता है पहचान बदल गई हमारी,
पहले क्या थे और अब क्या हो गए

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